गंतव्य की ओर
गंतव्य की ओर
मचा है हर तरफ शोर
पकड़ कर मौन की डोर
चल पड़ी गंतव्य की ओर
मंत्रो का कवच ओढ
नकारात्मकता को तोड़
चल पड़ी गंतव्य की ओर
बढ़ते जाते जैसे कदम
छूटता जाता अहम्
मिटते जाते भरम
हर सांस मे है विश्वास
भरा देव का आशीर्वाद
पकड़ उनका हाथ
चल पड़ी गंतव्य की ओर
मचा है हर तरफ शोर
पकड़ कर मौन की डोर
चल पड़ी गंतव्य की ओर
चल पड़ी गंतव्य की ओर....
सृष्टि सिंह



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