रेंगते कीड़े







रेंगते कीड़े 

उन रेंगते हुए कीड़ों  को 

तुम तितलियाँ बना देना 


किसी के मन में वो कीड़े पले 

या कुचले जायें किसी पैरों तले 

भागे इधर -उधर 

कभी रेंगते , कभी सटपटाते 

कभी भटकते , कभी चोट खाते


इससे पहले हो उनका नुक्सान 

बन कर तितलियाँ वो भरे उड़ान 

दुर्गन्ध को सुगन्ध में तुम घुला देना 

उनका परिसर महका देना 

उड़ान भरें ऊँची , 

ऐसी उनको हवा देना 


उन रेंगते हुए कीड़ों को 

तुम तितलियाँ बना देना 

सृष्टि  

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