एक कविता लिखी... फिर मिटा दी
एक कविता लिखी...
फिर मिटा दी
हाल ए सुकून
क्यों मैं लिखूँ
उस अलौकिक स्पर्श की क्यों लिखूँ बात
न दीखते हुए भी, जिसने पकड़ा है हाथ
सौ लोगो के बीच भी एकांत
वह भीड़ मे मन जो है शांत
क्यूँ लिखूँ वह अनमोल भाव
बन गया जो अब स्थायी स्वभाव
क्यूँ लिखूँ वह जो लिख नही सकती
शब्दों मे डाल नही सकती भक्ति
सोचते सोचते एक पन्ना आज फिर से भर गया
पर जो लिखना चाहा था, वह आज भी रह गया
ShristeeSingh



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